Outsource Employee Regularization: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि सरकारी विभागों में लंबे समय तक आउटसोर्स के जरिए काम कराना ठीक नहीं है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस व्यवस्था को कर्मचारियों के साथ अन्याय और शोषण से जोड़ते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति सालों तक लगातार काम करता है तो उसे अस्थायी रखना गलत है। यह मामला बरेली नगर निगम से जुड़ा है जहां एक कर्मचारी कई वर्षों से काम कर रहा था लेकिन उसे नियमित नहीं किया गया। इसी को लेकर कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी जिस पर अब विस्तार से सुनवाई हुई है।
लगातार काम लेने के बाद भी स्थायी नहीं बनाना गलत
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर किसी कर्मचारी से लंबे समय तक लगातार काम लिया जा रहा है और उसका काम विभाग के लिए जरूरी है तो उसे आउटसोर्सिंग के जरिए रखना सही नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में कर्मचारी पूरी जिम्मेदारी निभाता है लेकिन उसे स्थायी कर्मचारी जैसी सुविधा नहीं मिलती। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तरीका एक तरह से शोषण की स्थिति पैदा करता है जिसमें कर्मचारी काम तो पूरा करता है लेकिन उसे अधिकार नहीं मिलते।
कर्मचारी का लंबा कार्यकाल बना मुद्दा
यह मामला कफी अहमद खान से जुड़ा है जो साल 2011 से बरेली नगर निगम में कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे थे। शुरुआत में उन्हें दैनिक वेतन पर रखा गया और बाद में उनकी सेवा ठेकेदार के माध्यम से जारी रखी गई। इतने लंबे समय तक लगातार काम करने के बावजूद जब उन्होंने खुद को स्थायी करने की मांग की तो विभाग ने इसे खारिज कर दिया। इसी फैसले के खिलाफ उन्होंने कोर्ट का रुख किया था जहां अब इस पूरे मामले पर सुनवाई हुई।
सरकार को जिम्मेदारी निभाने की बात कही
न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान ने अपने आदेश में कहा कि राज्य को एक आदर्श नियोक्ता की तरह काम करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि सरकार को अपने कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण और जिम्मेदार व्यवहार करना चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति से सालों तक काम लेने के बाद भी उसे अस्थायी बनाए रखना उचित नहीं है और यह व्यवस्था संतुलित नहीं मानी जा सकती।
नियमित भर्ती से बचने पर जताई चिंता
कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार विभाग नियमित भर्ती करने के बजाय आउटसोर्सिंग का रास्ता चुन लेते हैं जो सही तरीका नहीं है। जब किसी विभाग में काम लगातार बढ़ रहा हो तो वहां नए पद बनाने चाहिए और स्थायी भर्ती करनी चाहिए। आउटसोर्सिंग के जरिए काम कराना आसान जरूर लगता है लेकिन इससे सिस्टम पर असर पड़ता है और कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
उम्र सीमा पार होने की समस्या भी सामने आई
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी बताया कि लंबे समय तक अस्थायी रूप से काम करने वाले कर्मचारियों के सामने एक और बड़ी दिक्कत आती है। ऐसे कर्मचारी धीरे-धीरे उस उम्र तक पहुंच जाते हैं जहां वे नई भर्ती में शामिल नहीं हो पाते। इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने कई साल काम किया लेकिन स्थायी नौकरी का मौका भी खो दिया। कोर्ट ने इसे गंभीर स्थिति बताया और इस पर ध्यान देने की बात कही।
चार महीने में दोबारा निर्णय लेने का निर्देश
इन सभी पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने बरेली नगर निगम के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही नगर आयुक्त को निर्देश दिया गया है कि चार महीने के भीतर इस मामले की दोबारा समीक्षा की जाए और नियमों के अनुसार कर्मचारी के नियमितीकरण पर फैसला लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में केवल कागजी आधार पर निर्णय लेना सही नहीं है बल्कि कर्मचारी की पूरी सेवा अवधि और काम को भी ध्यान में रखना जरूरी है।


